हो जाता ‘वो’ प्लान कामयाब, तो आजादी 1915 में मिलती और ‘राष्ट्रपिता’ गांधी नहीं, ये शख्‍स होता..!

जंगल के शेर से कम नहीं था – साथी की गद्दारी से हुआ शहीद – टूटा भारत आज़ादी का सपना

33135

भारत की आज़ादी के सिपाहियों की बात आती है तो गिने चुने नाम ही याद आते है. सबसे पहले महात्मा गांधी का नाम आता है और उसके बाद शहीद भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद, तिलक, सुभाष चन्द्र बोस आदि के नाम आते है. ऐसे कितने ही नाम है जो भुलाये जा चुके है लेकिन उनका योगदान भारत की आज़ादी की लड़ाई में भुलाया नहीं जा सकता. आज ऐसे ही एक भूले-बिसरे क्रांतिकारी के बारे में आपको बताते है.

आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखे जाने के वक्त नाइंसाफी का शिकार होने वालों में एक ऐसा क्रांतिकारी भी था, जिसका प्लान अगर कामयाब हुआ होता, या साथी ने गद्दारी नहीं की होती तो देश को ना गांधी की जरूरत पड़ती और ना बोस की। देश भी 32 साल पहले ही यानी 1915 में आजाद हो गया होता। उस दौर का हीरो था वो, जब खौफ में लोग घरों में भी सहम कर रहते थे, वो अकेला जहां अंग्रेजों को देखता, उन्हें पीट देता था, यतीन्द्र नाथ मुखर्जी के बारे में यही मशहूर था। एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्र नाथ ने अकेले ही आठ-आठ अंग्रेजों को पीट दिया था।

source

बलिष्ठ देह के स्वामी यतीन्द्रनाथ मुखर्जी साथियों के बीच बाघा जतिन के नाम से मशहूर थे। बंगला के नादिया में पैदा हुए थे, जतिन जो अब बांग्लादेश में है। पिता की मौत के बाद मां शरतशशि ने ही अपने मायके में उनकी परवरिश की, शुरू से ही उनकी रुचि फिजिकल गेम्स में रही, स्विमिंग और हॉर्सराइडिंग के चलते वो बलिष्ठ शरीर के स्वामी बन गए।

अगले पेज पर जानिये 11 साल की उम्र में उनका वो कारनामा जिसकी वजह से उन्हें पहचान मिली…!

1 of 6

Loading...
Loading...