आज भी मुक्ति के लिए पिसावा में भटक रहे हैं अश्वस्थामा, जानें क्यों नहीं हुई उनकी मृत्यु

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ब्रजभूमि के पिसावा गांव से एक किमी दूर भयानक झाडियां हैं। जिन्हें झाडी़ वाले बाबा का जंगल कहते हैं। इस में कई देवी-देवताओं के प्राचीन मंदिर हैं और महाभारत के अमर वीर अश्वत्थामा का निवास है। स्थानीय लोगों की ही नहीं, यह  सच्चाई पुराणों में भी वर्णित है। उनके डर से कोई भी जंगल की लकडी़ लेकर बेच नहीं सकता। ऐसा करने वाले इस रहस्यमय क्षेत्र में भूल से भी नहीं आते हैं। हालांकि कुछ लोगों के अनुसार मध्य प्रदेश राज्य के असीरगढ़ किले स्थित एक शिव मंदिर में भी वे प्रतिदिन पूजा करने जाते हैं

इस बारे में अंतिम कहानी जानने से पहले हर किसी के मन में यही सवाल उठेंगे कि आखिर महाभारत युद्ध में अश्वत्थामा के साथ ऐसा क्या हुआ था? क्या वह अन्य योद्धाओ की तरह युद्ध में वीरगति को प्राप्त नहीं हो पाया या फिर उसे जीवनभर भटकने का शाप मिला था? वह पिसावा के जंगलों में भटक रहे हैं तो स्थानीय लोगों को तो कोई नुकसान नहीं होता? तगडे़ बंम्बे में कितने जहरीले जीव रहते हैं झाडियों से सटे? जाहिर है आपके द्वारा देखे गए ग्रंथों में अर्जुन, कर्ण, श्रीकृष्ण, भीम, भीष्म, दोर्णाचार्य और दुर्योधन जैसे महारथी हो वहां अश्वत्थामा पर बहुत ही कम ध्यान गया होगा। लेकिन अश्वत्थामा महाभारत के ऐसे पात्र रहे हैं जो यदि चाहते, तो युद्ध के स्वरूप को ही बदल सकते थे।

Source : Charanamrit
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1.अश्वथामा – ग्रंथों में भगवान शंकर के अनेक अवतारों का वर्णन भी मिलता है। उनमें से एक अवतार ऐसा भी है, जो आज भी पृथ्वी पर अपनी मुक्ति के लिए भटक रहा है। ये अवतार हैं गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र अश्वत्थामा का। द्वापरयुग में जब कौरव व पांडवों में युद्ध हुआ था, तब अश्वत्थामा ने कौरवों का साथ दिया था। महाभारत के अनुसार अश्वत्थामा काल, क्रोध, यम व भगवान शंकर के सम्मिलित अंशावतार थे। अश्वत्थामा अत्यंत शूरवीर, प्रचंड क्रोधी स्वभाव के योद्धा थे। धर्म ग्रंथों के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने ही अश्वत्थामा को चिरकाल तक पृथ्वी पर भटकते रहने का श्राप दिया था। अश्वथाम के संबंध में एक प्रचलित मान्यता… “मध्य प्रदेश के बुरहानपुर शहर से 20 किलोमीटर दूर एक किला है। इसे असीरगढ़ का किला कहते हैं। इस किले में भगवान शिव का एक प्राचीन मंदिर है। यहां के स्थानीय निवासियों का कहना है कि अश्वत्थामा प्रतिदिन इस मंदिर में भगवान शिव की पूजा करने आते हैं।”

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