धर्म-परायण महावीर गोकुला जाट की शौर्यगाथा

1887

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धर्म का मर्म समझने और संरक्षण करने वाले क्षत्रियों का तो अब घोर अकाल प्रतीत होता है, आर्यभूमि की इस महान क्षत्रिय परम्परा को, जिसके शौर्य के आगे आर्य भूमि के अंदर कोई घुसने का साहस न करता था आज उसके घर के अंदर घुस कर विधर्मी न जाने क्या क्या कर डालते हैं ?
क्यूंकि जिस क्षत्रिय परम्परा के शौर्य और वीरता से पूरा विश्व थर थर काँपता था,जिसकी कीर्ति दोपहर के सूर्य के सामान तीव्रतम तेज थी, उसी क्षत्रिय वंश को दंतहीन करने का कार्य कभी अशोक जैसे धर्म-बदलू वर्ण-संकर ने किया तो कभी मुसलमानों ने और फिर अंग्रेजों ने, वर्तमान में उसे नेहरूवादी हिंदुत्व के ठेकेदार आगे बढ़ा रहे हैं l

पृथ्वीराज चौहान, महाराज शिवाजी, महाराणा प्रताप की शूरवीरता से तो आप सब परिचित ही हैं परन्तु इनके अलावा और ऐसे असंख्य महावीर शूरवीर हैं, जिन्होंने सनातन धर्म की रक्षार्थ अपने शौर्य और पराक्रम से जन जन को प्रेरित किये रखा,जिनके बारे में हमे पढ़ाया नही गया l

ऐसे ही एक महान शूरवीर गोकुल सिंह जिसे इतिहासकार ‘गोकुला’ महान के नाम से परिचित करवाते हैं, आज उनकी शूरवीरता से आपको परिचित करवा रहा हूँ

भारत का नेपोलियन कहे जाने वाले महान मराठा राजराजेश्वर श्री यशवंतराव होल्कर जिन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध अभियान छेड़ा, परन्तु उस समय के सिख राजाओं ने अंग्रेजों के साथ सन्धि की और अंग्रेजों के धन तथा सेना की सहायता दी, जिसमे लाहोर के सिख राजा रंजीत सिंघ, कपूरथला के सिख राजा फतेह सिंघ, पटियाला का सिख राजा रणधीर सिंघ और जस्सा सिंह भी शामिल थे, इतिहासकार मानते हैं कि यदि यह विश्वासघात और देशद्रोह सिख राजाओं द्वारा यशवंतराव होल्कर के साथ न किया गया होता तो संभवत: अंग्रेजों को 1857 के विद्रोह से पूर्व ही भारत की पवित्र भूमि से खदेड़ दिया गया होता l

तो आज प्रस्तुत है सबसे पहले मथुरा बृज प्रदेश के धर्मपरायण महावीर गोकुला की शौर्यगाथा l

गोकुल सिंह अथवा गोकुला सिनसिनी गाँव का सरदार था ।

10 मई 1666 को जाटों व औरंगजेब की सेना में तिलपत में लड़ाई हुई। लड़ाई में जाटों की विजय हुई। मुगल शासन ने इस्लाम धर्म को बढावा दिया और किसानों पर कर बढ़ा दिया। गोकुला ने किसानों को संगठित किया और कर जमा करने से मना कर दिया। औरंगजेब ने बहुत शक्तिशाली सेना भेजी। गोकुला को बंदी बना लिया गया और 1जनवरी 1670 को आगरा के किले पर जनता को आतंकित करने के लिये टुकडे़-टुकड़े कर मारा गया। गोकुला के बलिदान ने मुगल शासन के खातमें की शुरुआत की।

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