एक बार फिर मुश्किलों में फंसी आम आदमी पार्टी, चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद जा सकती है सदस्यता?

इसके साथ ही इनकी सदस्यता का क्या होना चाहिए, क्या इनकी सदस्यता रद्द कर दी जानी चाहिए?

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देश की एक राजनीतिक पार्टी जिसका विवादों और घोटालों से हमेशा से ही चोली-दामन का साथ रहा है एक बार फिर अपने किये काण्ड में फंसती नज़र आ रही है| यहाँ हम जिस पार्टी की बता कर रहे हैं वो है देश को बदलने का ख्वाब देखने वाली आम आदमी पार्टी| इस पार्टी ने शुरुआत तो कुछ ऐसे की थी कि मानो देश में क्रांति आ जाएगी, लेकिन इस पार्टी का इतिहास उठा कर देखिये तो मात्र घोटालों, जनता को चूना लगाना, धोखाधड़ी, दोषारोपण के अलावा शायद ही आपके हाथ कुछ और लगे|

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ऐसे में एक बार फिर आम आदमी पार्टी द्वारा की गयी गड़बड़ी के मामले में पार्टी की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही है। दरअसल चुनाव आयोग ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में आम आदमी पार्टी को ऐसा करारा झटका दिया है, जिससे वो शायद ही उबर पाए| चुनाव आयोग ने अपने आदेश में आम आदमी पार्टी की दलीलों को खारिज कर दिया हैं| बता दें कि दिल्ली हाई कोर्ट इस मामले में पहले ही विधायकों की विवादित पद पर नियुक्ति को अवैध ठहरा चुका है।

 

दरअसल चुनाव आयोग लाभ के पद के मामले में सुनवाई कर रहा है। इस मुद्दे पर आम आदमी पार्टी ने आयोग से अपील की थी कि जब दिल्ली हाई कोर्ट ने नियुक्तियां रद्द कर ही दी हैं तो अब आयोग को सुनवाई नहीं करनी चाहिए लेकिन चुनाव आयोग ने अरविंद केजरीवाल सरकार की इस दलील को रद्द कर दिया है। बताते चलें कि चुनाव आयोग के इस फैसले के बाद अब राष्ट्रपति को भेजे जाने वाली राय के लिए सुनवाई की जाएगी। सुनवाई के बाद आयोग राष्ट्रपति को अपना मत भेजेगा कि इन विधायकों की नियुक्ति की प्रमाणिकता पर उठे सवालों के जवाब क्या हैं? इसके साथ ही इनकी सदस्यता का क्या होना चाहिए, क्या इनकी सदस्यता रद्द कर दी जानी चाहिए?

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जान लीजिये क्या है पूरा मामला?

दरअसल आम आदमी पार्टी ने 13 मार्च 2015 को पार्टी के 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाया था जिसके बाद 19 जून को एडवोकेट प्रशांत पटेल ने राष्ट्रपति के पास इन सचिवों की सदस्यता रद्द करने के लिए आवेदन किया। आवेदन के जवाब में राष्ट्रपति की ओर से 22 जून को शिकायत चुनाव आयोग में पहुंचा दी गयी, जिसमें कहा गया कि क्योंकि यह लाभ का पद है ऐसे में इन विधायकों की सदस्यतता रद्द की जानी चाहिए। अपने बचाव में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि विधायकों को संसदीय सचिव बनकर कोई ‘आर्थिक लाभ’ नहीं मिला है| जिसके बाद इस मामले को रफादफा करने के लिए आप विधायकों ने चुनाव आयोग में अपील की थी| वहीं, राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार के संसदीय सचिव विधेयक को मंजूरी देने से भी इनकार कर दिया था।